Vibhats Ras

वीभत्स रस की परिभाषा | Vibhats Ras Ke Udaharan

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वीभत्स रस की परिभाषा | Vibhats Ras Ke Udaharan जब किसी स्थिति या दशा के प्रति हमारे मन में घृणा का भाव उत्त्पन हो जाता है , तो वह वीभत्स रस होता है। , वीभत्स रस में किन किन चीजों का वर्णन होता है। जिसे आधार पर आप कह सकते है की इस पंक्ति में या इस कविता में वीभत्स रस है।

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जब कविता में या पंक्ति में जब किसी मृत्य शरीर का वर्णन हो, जब किसी शव या लाश का वर्णन हो , अस्थियो का वर्णन हो , मांस मज्जा का वर्णन हो या रक्त का वर्णन हो , कौवे या गिद्धों का वर्णन हो जो उस मांस को खाते हो या किसी भी जानवर का वर्णन हो जो मांस खता हो तो वह वीभत्स रस मन सकते है।

वीभत्स रस का स्थायी भाव – जुगुप्सा ( घृणा ) , जुगुप्सा और घृणा दोनों वीभत्स रस के स्थायी भाव है लेकिन सबसे ज्यादा प्राथमिकता जुगुप्सा को मिलता है। वीभत्स रस का आश्रय – वीभत्स रस की कविताओं में या वीभत्स रस वाली पंक्तियों में उसमे आश्रय वह व्यक्ति होता है , जिसे हृदय में घृणा का भाव जगता हो।

वीभत्स रस का विषय – वीभत्स रस में जहा श्मशान , मांस , शव तथा घिनौनी वस्तुए जहा हो वह वीभत्स रस का विषय होती है।
वीभत्स रस का उद्दीपन – गिद्धों का मांस नोचना , मांस के सड़न , अस्थिया आदि का वर्णन किया गया हो तो ये सब उद्दीपन का कार्य करती है।
वीभत्स रस का अनुभाव – आश्रय जिसके मन में घृणा का भाव होता है वह मुँह फेर लेता है नाक बंद कर लेता है , थूकता है या आँखे बंद कर लेना ये सब जो भाव पैदा होती है आश्रय के मन में तो वे अनुभाव का कार्य करती है।
वीभत्स रस का संचारी – संचारी भाव का कार्य करते है आवेग , निर्वेद , चिंता , जड़ता ये सब संचारी भाव होते है।

Vibhats Ras Ke Udaharan | वीभत्स रस का उदाहरण

सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत।।
गीध जाँघि को खोदी खोदी कै मांस उपारत।
स्वान अँगुरिन काटि काटि कै खात विदारत।।

यहाँ पर एक शव का वर्णन किया गया है जिसे ये सब प्राणी शव को छत्र व्हिचत्र करने में लगे यूए है सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत। इस पंक्ति में घृणा का वर्णन किया गया है , की शव के सिर पर बैठा काग मतलब कौआ दोनों आखो को नोच कर कर खाता है।

खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत।। इस पंक्ति में सियार जो कुत्ते जैसा प्राणी होता है वह जीभ को नोचता है , गीध जाँघि को खोदी खोदी कै मांस उपारत। इस पंक्ति में गीध शव के जांघ का मांस को खींच खींच कर खाता है , स्वान अँगुरिन काटि काटि कै खात विदारत।। इस पंक्ति में स्वान का मतलब कुत्ता शव की उंगलियों को काट काट कर खाता है। तो इस चारो पंक्ति में घृणा का भाव उत्त्पन हो रहा है। और ये सब स्थितियां घृणा का भाव उत्त्पन करने में उद्दीपन का कार्य कर रही है।

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