Bhakti Story

Swastik ka Rahasya Bhakti kahani

Swastik ka Rahasya Bhakti kahani

Swastik ka Rahasya Bhakti kahani स्वस्तिक, इसमें पुरे ब्रह्माण्ड की शक्तियों का निवास है. हमारे ऋषि मुनियों ने योग और वरदान की शक्तियों से कई चिन्हों की रचना की, हर एक चिन्ह की अपनी एक खास शक्ति होती है. ऐसा ही एक चिन्ह है स्वस्तिक जिसमें पुरे ब्रह्मांड की शक्तियां समायी हुई हैं.

 

Swastik ka Rahasya Bhakti kahani

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स्वस्तिक सभी चिन्हो में सर्वोत्तम है. इसीलिए हर मंगल कार्य में इसका प्रयोग किया जाता है. यह चिन्ह सकारात्मक ऊर्जा का भडार है. इस चिन्ह का प्रयोग करने पर नकारात्मक शक्तियां भाग जाती है. यह दो प्रकार का होता एक बायाँ स्वास्तिक और एक दायां स्वास्तिक. बायां स्वास्तिक  नारी का और दायां स्वास्तिक नर का स्वरुप माना जाता है.

 

Swastik ka Rahasya Bhakti kahani

 

जैसा की आप इस पोस्ट के माध्यम से जान गए हैं कि स्वस्तिक में पूरा ब्रह्मांड होता है. स्वास्तिक की खडी सीधी रेखा संसार की उत्पत्ति की प्रतिक होती है और तिरछी रेखा संसार की विस्तार की प्रतिक होती है, इसके अलावा स्वस्तिक के मध्य में जो विन्दु अंकित होता है उसे भगवान श्री नारायण हरी का नाभि कमल माना जाता है. विष्णुपुराण की अनुसार इसी नाभिकमल से इस संसार की उत्त्पत्ति हुई है. स्वस्तिक की चार विन्दुओं को चारो दिशाओं का प्रतिक माना जाता है. कुछ लोगों की मान्यताये हैं कि स्वास्तिक की रेखा चारो वेदों  ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद की प्रतिक हैं.

 

Swastik ka Rahasya Bhakti kahani

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स्वस्तिक का हिन्दू धर्म में विशेष स्थान है. किसी भी शुभ कार्य में सर्वप्रथम स्वस्तिक का प्रयोग अवश्य ही किया जाता है. स्वस्तिक अर्थात “सु” धन अस्ति, यहाँ पर आपको बता दें कि ” सु” का मतलब होता है ” शुभ ” और “अस्ति ” का मतलब होता है “होना ” अर्थात शुभ होना और यही कारण है कि हिन्दू धर्म के किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में स्वस्तिक का प्रयोग अवश्य ही होता है.

 

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