Bhakti Story

Pauranik Katha Bhakti kahani Matsyavatar in hindi

 Pauranik Katha Bhakti kahani Matsyavatar in hindi जब पृथ्वी परमहाप्रलय आया… पृथ्वी पूरी तरह जलमग्न हाे रही थी. हर जगह सिर्फ और सिर्फ जल ही दिखायी दे रहा था…. तब भगवान श्री विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण करके सर्व प्रकार के जीव जन्तुओं, पेड़ पाैधाे मानव आदि काे राजा सत्यव्रत मनु के द्वारा इकठ्ठा करवाया…. यह श्री मत्स्य अवतार  नारायण हरि का प्रथम अवतार है… यह कथा इस प्रकार है…..

एक बार जब ब्रह्मा जी साे रहे थे ता उनकी नाक से “हयग्रीव” नामक राक्षस निकला… और वाे वेदाे काे चुराकर गहरे अथाह सागर में जा छुपा… इधर पृथ्वी पर प्रलय का समय निकट आ गया था….

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bhagwan vishnu

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तब वेदाे काे बचाने के लिए प्रभु विष्णु ने Pauranik Katha Bhakti kahani Matsyavatar in hindi  धारण किया  ... और उन्हाेने राजा सत्यव्रत मनु की परीक्षा लेने की साेची…. क्याेकि वेदाे के चाेरी हाे जाने के कारण चाराे तरफ अधर्म का बाेलबाला हाे गया था….लेकिन राजा तक अधर्म पाप रूपी अंधकार नही पहुंच सका था…. वे पुण्य रूपी प्रकाश से चमक रहे थे.

राजा सत्यव्रत बहाेत ही पुण्यात्मा और दयालु हृदय के थे… एक राेज प्रतिदिन की भांति राजा कृतमाला नामक नदी के किनारे ध्यान कर रहे थे ….ध्यान के बाद राजा नदी मे स्नान हेतु गये… स्नान के पश्चात उन्हाेने तर्पण के लिए अंजलि में जल लिया ताे जल के साथ ही एक छाेटी सी मछली उनके हाथ मे आ गयी …..सत्यव्रत ने मछली काे नदी में छाेड़ दिया… ताे मछली विनम्रता पूर्वक बाेली …..हे राजन! नदी के बड़े जीव हम जैसे छाेटे जीवाें काे मारकर खा जाते हैं… मुझे यहां बहाेत डर लग रहा है… कृपा कर के मेरे प्राणाे की रक्षा करें.. मुझे किसी सुरक्षित स्थान पर ले चलें… मैं आपके शरण में आयी हूं.

राजा काे उस पर दया आ गयी… उन्हाने उस मछली काे कमंडल में रख लिया…. लेकिन कुछ ही देर मे मछली ने कहा.. महाराज मुझे यहा से निकालिये… निकालिये महाराज…

राजा ने देखा ताे वे आश्चर्यचकित रह गये… जाे मछली अभी एकदम छाेटी सी थी… वह अब इतनी बड़ी हाे गयी थी कि कमंडल में उसका रहना मुश्किल हाे गया था….

अब राजा ने उसे कमंडल से निकालकर एक पानी भरे घड़े में रख दिया ….लेकिन यह क्या कुछ देर के बाद फिर मछली का शरीर बढ़ गया और उसने फिर से आवाज लगायी…. अब सत्यव्रत ने उसे घड़े से निकालकर एक सराेवर में रख दिया…. लेकिन यह क्या सराेवर भी छाेटा पड़ गया….

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राजा आश्चर्यचकित हाे गये. लेकिन वह मछली उनके शरण में आयी थी ऐसे में उनका कर्तव्य था कि वे उसकी रक्षा करें… उन्हाेने उसे सराेवर से निकालकर नदी में रख दिया… लेकिन वहा भी वही हाल रहा…

अब राजा दुविधा में पड़ गये कि अब कहा रखा जाये…उन्हाेने साेच विचार कर मछली काे नदी से निकालकर समुद्र मे डाल दिया… लेकिन वह मछली इतनी बड़ी हाे गयी कि सागर भी उसके लिए छाेटा पड़ गया… फिर मछली ने आग्रह किया कि हे राजन! यह समुद्र भी अब छाेटा पड़ रहा है… मेरे रहने की कुछ और व्यवस्था करें….

अब राजा सत्यव्रत मनु पूरी तरह विस्मृति हाे गये… वे विस्मयाभिभूत हाेकर हाथ जोड़कर बाेले… आपने ताे मुझे दुविधा में डाल दिया है… जिस तीव्रता से आपका शरीर दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है ..उससे यह प्रतीत हाेता है कि आप काेई साधारण मछली नही हैं… आप जरूर काेई अवतार हैं… आप अपने दिव्य रूप का दर्शन देकर मेरी दुविधा का निवारण करें.. मै आपकी शरण मे आया हूँ.

तब भगवान श्री नारायण हरि ने अपना दिव्य रूप प्रकट किया और अपने इस अवतार की वजह बतायी…श्री हरि ने कहा कि सत्यव्रत इस समय सम्पूर्ण जगत में पाप अधर्म का साम्राज्य फैला है… चाराे तरफ भयंकर घृणा भरी हेै… लाेग एक दूसरे के खून के प्यासे हाे गये हैं…. व्यभिचार, मादक पदार्थाे का सेवन आम बात हाे गयी है…

हे राजन मै आपकी परीक्षा ले रहा था… आप उन अधर्माे से दूर है… आपमें दया भाव है…..

हे राजन! ठीक सातवे दिन यह पृथ्वी जलमग्न हाे जायेगी… जल के सिवा यहा और कुछ दृष्टिमान नही हाेगा… साे पुन: जीवन चक्र शुरू करने हेतु आप सभी जीव जन्तुओं, पशु पक्षियाें के एक एक जोडे़ तथा अनाजाे औषधियाें और सप्तरिषियाे के साथ  नाव पर बैठ जाइयेगा…. मेरी प्रेरणा से नाव आपके पास आ जायेगी… और वासुकि नाग के माध्यम से उस नाव काे मेरे मत्स्य रूपी अवतार से बांध लेना…..मै उसी समय आपकाे फिर दिखुगां और आपकाे आत्मतत्व की ग्यान दूगां….

उसके बाद प्रभु अंतर्ध्यान हाे गये…. सत्यव्रत ने यह बात रानी और सप्तर्षि काे बतायी और तैयारियाे में जुट गये… इधर मत्स्य अवतार में प्रभु ने हयग्रीव काे मारकर उससे वेदाे काे आजाद करा लिया…

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विष्णु

ठीक सातवे दिन प्रलय का दृश्य उतप्न हाे गया… भयंकर वर्षा हाेने लगी…. ऐसा प्रतीत हाे रहा था मानाे आकाश और धरती के बीच वर्षा रूपी सेतु बन गया हाे… सब कुछ जल मे समा जाने काे आतुर था…सत्यव्रत सप्तरिषियाे काे लेकर जीव जन्तुओं, अनाज आदि के बीजाे के साथ तट पर आ गये…. तब प्रभु की प्रेरणा से नाव तट पर आ पहुंची…. सब लाेग उसमे सवार हाे गये…

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Bhagwan vishnu

प्रलय रूपी सागर मे नाव हिचकाेले खाने लगी… सभी सप्तर्षि, सत्यव्रत मनु  श्री नारायण हरि की प्रार्थना करने लगे… प्रार्थना से प्रसन्न हाेकर भगवान ने सबकाे दर्शन दिया…. भगवान ने उन्हें आत्मग्यान दिया… प्रलय खत्म हाेने के पश्चात फिर से संसार का निर्माण हुआ …इस तरह से भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लेकर वेदाे की रक्षा की और सृष्टि की रचना की. तो पाठकों यह Pauranik Katha Bhakti kahani Matsyavatar in hindi कैसी लगी अवश्य बताएं.

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