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दुर्वासा एक महान ऋषि

दुर्वासा एक महान ऋषि महर्षि दुर्वासा एक महान ऋषि थे और उन्हें इसीलिए “महर्षि ” की उपाधि प्राप्त थी. महर्षि दुर्वासा माता अनुसुइया और ऋषि अत्री के पुत्र थे. इसके बारे में और जानने के लिए इस लिंक Rishi durvasa ki kahaniu पर क्लिक करें. महर्षि दुर्वासा सतयुग, द्वापर और त्रेता तीनो ही युगों में थे. उनके दिए हुए श्राप और आशीर्वाद से कई घटनाएं हुई, जो की बड़े परिवर्तन का कारण बनी. आईये हम उनसे जुडी कुछ घटनाओं के बारे में जानते हैं.

दुर्वासा एक महान ऋषि आखिर सुदर्शन चक्र क्यों दुर्वासा ऋषि  के पीछे पड गया?

 

इक्ष्वाकु वंश के एक राजा थे अम्बरीश. अम्बरीष बहुत ही दयालु और न्यायप्रिय राजा थे. उनके शासन में प्रजा बहुत ही खुश थी. वे प्रजा के हर सुख दुःख का ख्याल रखते थे. इसके साथ ही राजा अम्बरीश भगवान श्री हरी के परम भक्त थे. उनकी भक्ति से भगवान नारायण बहुत अधिक प्रसन्न हुए और अपने सुदर्शन का नियंत्रण राजा अम्बरीश के हाथ में सौंप दिया. यह भी भगवान की एक लीला थी. भगवान के प्रत्येक कार्य में भविष्य का सार छुपा होता है.

 

दुर्वासा एक महान ऋषि

दुर्वासा एक महान ऋषि

 

एक बार की बात है राजा अम्बरीश और उनकी धर्मपत्नी ने एकादसी का व्रत किया और उस व्रत के पारण में ब्राह्मणों को भोजन के लिये आमंत्रित किया गया था और उस निमंत्रण में महर्षि दुर्वासा भी आये थे. भोजन करने के पहले महर्षि दुर्वासा यमुना जी में स्नान करने चले गए. इधर बहुत देर तक इन्तजार करने के बाद राजा अम्बरीश ने अन्य ब्राह्मणों से इस बारे में पूछा तो ब्राह्मणों ने कहा कि राजान आप पानी पी लीजिये या काना खाने और ना खाने के बराबर होगा. ब्राह्मणों की बात मानकर राजा ने ऐसा ही किया.

 

जब राजा ने व्रत खोल लिया तो उसके कुछ देर बाद महर्षि दुर्वासा वहाँ आ पहुँछे और यह देख कि राजा ने उनके अनुपस्थिति में ही व्रत खोल लिया है बहुत क्रोधित हुए और क्रोध में उन्होंने कृत्या राक्षसी की रचना की और उसे राजा अम्बरिश पर आक्रमण का आदेश दे दिया. अपने बचाव के लिए  राजा अम्बरीश ने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया और उसी क्षण सुदर्शन प्रकट हुआ और कृत्या राक्षसी का वध कर दिया और उसके बाद वह दुर्वासा ऋषि की तरफ बढ़ा.

 

अब ऋषि दुर्वासा अपने प्राण बचाने के लिए इधर उधर भागने लगे…भागते भागते वे इंद्र देव के पास पहुंचे और अपने प्राण बचाने की गुहार लगाईं, लेकिन इन्द्रदेव ने इसमे अपनी असमर्थता जताते हुए उन्हें भगवान ब्रह्मा के पास भेज दिया. भगवान ब्रह्मदेव ने भी इसमे असमर्थता जताई और उन्हें भगवान भोलेनाथ के पास भेज दिया और बाबा भोले ने उन्हें भगवान विष्णु के पास भेज दिया.

 

भगवान विष्णु के पास पहुँचने पर महर्षि दुर्वासा ने पूरी बात बताई. तब भगवान विष्णु ने कहा की हर जगह क्रोध ठीक नहीं होता है. इसमें मैं भी कुछ करने में असमर्थ हूँ क्योंकि इस समय सुदर्शन चक्र का नियंत्रण राजा अम्बरीश के पास है अतः आपको वहीँ जाना होगा. दुर्वासा जी को अपनी भूल का एहसास हो चुका था. वे तुरंत ही राजा के पास पहुंचे और सारी बात बताते हुए सुदर्शन को रोकने को कहा, तब राजा ने तुरंत ही सुदर्शन को रोक दिया. तो मित्रों मेरी यह स्टोरी दुर्वासा एक महान ऋषि कैसी लगी अवश्य ही बताय्यें और भी अन्य कहानी के लिये इस लिंक  Mahabharat Ke Pramukh Pandav Patra Bhag 1 Bhakti Story  पर क्लिक करें.

 

 

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